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आन्ध्र प्रदेश की कांग्रेस सरकार कौन चला रहा है [Andhra Pradesh :wovaisi & Congress]

आन्ध्र प्रदेश की कांग्रेस सरकार कौन चला रहा है ? कांग्रेस या ओबैसी ? या दोनों मिलकर ? जिस नरपिशाच मोहम्मद अब्दुल कादिर नामक कांस्टेबल ने 1990 मे हैदराबाद मे भडकी भयानक दंगे के दौरान जब पुलिस इंस्पेक्टर ने इसे दंगो को नियन्त्रित करने के लिए मुस्लिम दंगाई भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दिया तो इसने दंगाईयों के बजाय उस इंस्पेक्टर को ही गोलियों से भून दिया था | लेकिन आंध्रप्रदेश की कांग्रेस सरकार ओबैसी के आदेश से इसे बार बार पेरोल क्यों दे रही है ?

चित्र में जिसे को आप देख रहे है उसका नाम है मोहम्मद अब्दुल कादीर है. यह भूतपूर्व पुलिस कांस्टेबल है.
१९९० में हैदराबाद में दंगा हुआ उस दंगे में जब इसका सीनियर इसे एक दंगाई मुस्लिम भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दिया तो ये भीड़ पर गोली चलाने के बजाय उस सीनियर पर ही गोली चला दी. न्यायालय के द्वारा इसे आजीवन कारावास की सजा मिली है लेकिन अभी इसकी क्षमा याचना रास्ट्रपति के पास है. इसको छुड़ाने के लिए बहुत से मुस्लिम संगठन लगे हुए है. |

मित्रों, आन्ध्र की पहले की टीडीपी सरकार ने इसे एक मिनट भी पेरोल नही दिया, लेकिन आज की कांग्रेस सरकार इसे ओबैसी के कहने पर बार बार पेरोल पर रिहा कर रही है और इतना ही नही इसके पेरोल को बार बार बढाती भी रहती है |

मित्रों, ये दोनों ओबोसी असदुद्दीन ओबैसी जो हैदराबाद से सांसद है और अकबरुद्दीन ओबैसी जो हैदराबाद के चारमिनार से विधायक है इन दोनों का मुख्य मकसद भारत को इस्लामिक राष्ट्र घोषित करना है | 
अगर आप इनकी पार्टी मजलिसे ईतेहादुल मुस्लिम [MIM] के सम्मेलनो के वीडियो यूट्यूब पर देखेंगे तो ये बार बार कहते है कि भारत को इस्लामिक देश बनाना ही मुस्लमानों का प्रथम उद्देश्य होना चाहिए |

ये अकबरुद्दीन ओवैसीने कई बार हिंदूधर्म और हिंदू देवी देवताओ के बारे मे खुले मंच से बहुत ही अभद्र बाते कहीं है लेकिन राहुल और सोनिया इसे गलत नही मानते क्योकि इसने हिन्दुओ के देवी देवताओ को अपमानित किया है | आप इस वीडियो को देखे , इसमें ये नीच ओवैसी भगवान राम और उनकी माँ कौशल्यादेवी पर किस तरह अश्लील और अभद्र बाते कह रहा है |



लेकिन  राहुल और सोनिया तो यही चाहते है किभारत से हिंदुत्व खत्म हो जाये और हिन्दुओ को बार बार अपमानित किया जाये |

मित्रों, अभी कुछ दिन पहले इस अकबरुद्दीन ओवैसी पर जानलेवा हमला हुआ, मजे की बात ये की हमलावर भी मुस्लिम ही था जिसका वेशकीमती घर इन ओवैसी बंधुओ ने कब्जा कर लिया था |
इसका हालचाल लेने के लिए सोनिया गाँधी ने मुख्यमंत्री सहित पूरी आन्ध्रप्रदेश सरकार को उसके घर भेजा था और तो और केंद्रीय स्वस्थ्य मंत्री गुलाम नबी आज़ाद भी स्पेशल प्लेन से हैदराबाद उसका हालचाल लेने गए थे | 
मित्रों  जब बाला साहेब ठाकरे की धर्मपत्नी और उनके पुत्र की एकमहीने के भीतर ही दुखद मृत्यु हुआ था तब तात्कालीन प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा मातोश्री बाला साहेब को सात्वना देने गए थे तब लेफ्ट, सपा, और कांग्रेस ने संसद मे बहुत हंगामा मचाया था कि एक साम्प्रदायिक नेता के घर प्रधानमंत्री सात्वना देने क्यों गए ? और तो और उस समय शरद पवार कांग्रेस मे थे और जब शरद पवार गए तो कांग्रेस ने उनसे नोटिस देकर पूछा कि आप क्यों गए ?

आखिर इतना दोगलापन क्यों ? एक कट्टर मुस्लिम जिसके सैकडो भड़काऊ भाषण आज भी यू ट्यूब पर भरे पड़े है और जो संसद मे मुसलमानों को इस देश की ईंट से ईंट बजा देने का आह्वान करता है उसके घर जाना क्या कांग्रेस गलत नही समझती ? 
आन्ध्र के उपमुख्यमंत्री दामोदर राजा नरसिम्हा ओवैसी के घर जाकर उसका हाल चाल लेते हुए






आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी, ओवैसी के घर जाकर उसका हाल चाल लेते हुए


आन्ध्र के रेवेन्यूमंत्री रघुवीर रेड्डी, ओवैसी के घर जाकर उसका हाल चाल लेते हुए


आन्ध्र प्रदेश विधानसभा के स्पीकर एन मनोहर, ओवैसी के घर जाकर उसका हाल चाल लेते हुए

स्पीकर मनोहर, ओवैसी के घर नाश्ता करते हुए

स्पीकर खुद सहारा देकर ओवैसी को घर से बाहर ला रहे है

सोनिया गाँधी के निर्देश पर केंद्रीय स्वस्थ्य मंत्री गुलाम नबी आज़ाद ओवैसी के घर जाकर उसके स्वस्थ्य की जानकरी ली और सोनिया और राहुल को इस बारे मे रिपोर्ट दिया ..


मेरे हिंदू मित्रों, जागो और अपने जातिपाँति, ऊँचनीच आदि के भेदभाव भुलाकर संगठित हो जाओ | नही तो हिन्दुओ के लिए आने वाला कल बहुत ही भयानक होने वाला है |




यूपीए का सांसद असदुद्दीन ओबैसी

मित्रों, क्या भारत धर्मनिरपेक्ष है ? क्या भारत संयुक्तराष्ट्र के सिधांतों को मानता है ? क्या भारत मे हिंदू और मुस्लिम लोगो और उनके नेताओ के बीच भेदभाव नही किया जाता ? यदि हाँ तो फिर राहुल गाँधी का सबसे करीबी दोस्त और यूपीए का सांसद असदुद्दीन ओबैसी भारत और संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन हमास और हिजबुल्लाह के खूखार कमांडरों के साथ बार बार मिलने लेबनान के बेरुत और दहिल्या शहर मे क्यों जाता है ?


लेबनान मे गृहयुद्ध प्रभावित एरिया का निरीक्षण करता ओबैसी

मित्रों, क्या भारत धर्मनिरपेक्ष है ? क्या भारत संयुक्तराष्ट्र के सिधांतों को मानता है ? क्या भारत मे हिंदू और मुस्लिम लोगो और उनके नेताओ के बीच भेदभाव नही किया जाता ? यदि हाँ तो फिर राहुल गाँधी का सबसे करीबी दोस्त और यूपीए का सांसद असदुद्दीन ओबैसी भारत और संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन हमास और हिजबुल्लाह के खूखार कमांडरों के साथ बार बार मिलने लेबनान के बेरुत और दहिल्या शहर मे क्यों जाता है ?

मित्रों, इजराइली ख़ुफ़िया एजेन्सी मोसाद ने भारत सरकार को कई बार पत्र लिखकर कहा है कि आपका सांसद जो आपकी सरकार को समर्थन दे रहा है वो इजरायल मे आतंकवाद फैला रहा है और साथ ही भारत के गरीब मुस्लिम युवको का ब्रेनवाश करके उन्हें हमास और हिजबुल्लाह के लिए भर्ती करता है | लेकिन चूँकि भारत की कांग्रेस सरकार को सिर्फ हिंदू ही आतंकवादी नजर आते है इसलिए भारत सरकार ओबैसी को खुलेआम छुट दे दिया है |

मित्रों अभी कुछ दिन पहलेसंसद मे आसाम पर चर्चा के दौरान ओबैसी ने प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की उपस्थिति मे कहा कि "यदि भारत सरकार आसाम मे मुसलमानों का चाहे वो प्रवासी क्यों न हो ठीक ढंग से पुनर्वास नही करती और उन्हें उचित मुवावजा नही देती तो फिर भारत का मुसलमान इस देश की ईंट से ईंट बजा देंगे" लेकिन किसी भी कांग्रेसी सांसद ने ओबैसी के इस बयान की निंदा नही की | और तो और मीडिया ने भी इसको ब्रेकिंग न्यूज़ नही बताया सिर्फ टाइम्स नाउ ने ही इस खबर पर चर्चा की |

सबसे बड़ी चौकने वाला खुलासा ये है कि ओबैसी को डिप्लोमेटिक पासपोर्ट राहुल गाँधी की सिपारिश पर मिला था जबकि खुद आन्ध्रप्रदेश की कांग्रेस की ही सरकार की ख़ुफ़िया पुलिस ने ओबैसी को डिप्लोमेटिक पासपोर्ट न देने की रिपोर्ट भेजी थी लेकिन जब राहुल गाँधी ने इस मामले मे हस्तक्षेप किया जब जाकर विदेश मंत्रालय ने ओबैसी को बिना किसी योग्यता और अहर्ता के डिप्लोमेटिक पासपोर्ट इस्शु कर दिया |

मित्रों, साधारण  पासपोर्ट का कलर नीला होता है बल्कि डिप्लोमेटिक पासपोर्ट का कलर मैरून होता है और डिप्लोमेटिक पासपोर्ट रखने वाले व्यक्ति की किसी भी हवाईअड्डे पर तलाशी नही होती और इन्हें "वीजा आन अराइवल" की भी सुविधा होती है और ये पासपोर्ट केवल राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केबिनेट स्तर के मंत्री और राज्यों मे मुख्यमन्त्रियो और राजदूत तथा दूतावास मे सचिव स्तर के अधिकारियों  को ही इस्शु हो सकता है | 


मित्रों, हिजबुल्लाह आज विश्व का सबसे बड़ा आत्मघाती दस्ते वाला आतंकवादी संगठन है जो छोटे छोटे बच्चो को अपने आत्मघाती दस्ते मे भर्ती करता है | लेबनान पहले धर्मनिरपेक्ष देश था और वहाँ ४% हिंदू और १०% यहूदी  भी रहते थे | लेबनान जहां पहले ८०% ईसाई तथा अन्य धर्म और २०% मुस्लिम रहते थे और लेबनान विश्व का बहुत तेजी से तरक्की करता हुआ मुल्क था | और इसकी राजधानी बेरुत को विश्व का गोल्ड केपिटल कहा जाता था क्योकि बेरुत विश्व की सबसे बड़ी सोने की मण्डी थी | इतना ही नही खूबसूरत लेबनान मे कई हालीवुड और बोलिउड की फिल्मो की शूटिंग होती थी | रामानंद सागर ने सत्तर के दशक मे धर्मेन्द्र और माला सिन्हा को लेकर एक फिल्म बनाई थी जिसका नाम "आखें' उस फिल्म की 80% शूटिंग बेरुत मे हुई थी और कई गाने जैसे "मिलती है जिंदगी मे मोहब्बत कभी कभी" की शूटिंग भी बेरुत मे ही हुई |



लेकिन लेबनान की तरक्की और खुशहाली पर लेबनान  के मुस्लिम लीडरो ने ग्रहण लगा दिया |मस्जिदों मे और अपने सम्मेलनों के मुसलमानों को खूब बच्चे पैदा करके लेबनान पर क्ब्ज्जा करने की बाते करते थे | फिर धीरे धीरे लेबनान का जनसंख्या का संतुलन बिगड गया और फिर लेबनान 25 सालो से गृहयुद्ध की चपेट मे आ गया | आज लेबनान के दो हिस्से है उत्तरी लेबनान जिसमे ईसाई और अन्य धर्मो के लोग रहते है और दक्षिण लेबनान जहां मुस्लिम रहते है उसी तरह राजधानी बेरुत का भी दो अघोषित हिस्सा है जहां एक तरह ईसाई और दूसरी तरफ मुस्लिम रहते है |


मित्रों, जब भी कोई सांसद विदेश यात्रा करता है तो उसे लोकसभा अध्यक्ष की लिखित अनुमति लेनी पडती है भले ही वो उसकी निजी यात्रा ही क्यों न हो | एक आरटीआई के जबाब मे मीरा कुमार ने पहले बताया कि उनके पास ऐसी कोई फ़ाइल नही आई जिसमे ओबैसी ने लेबनान और सीरिया के यात्रा की अनुमति मांगी हो |


अब सवाल ये उठता है कि आखिर इतना घोर साम्प्रदायिकता फ़ैलाने वाला ओबैसी को कांग्रेस साम्प्रदायिक क्यों नही मानती ? 


मित्रों, कांग्रेस की नजर मे  सिर्फ भारत के हिंदू ही साम्प्रदायिक है | अगर कोई भारत मे हिंदू हित की बात करेगा तो वो घोर साम्प्रदायिक और राजनितिक रूप से अछूत बन जायेगा | पूरी मीडिया और कांग्रेस सहित कुछ तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अपनी दुकान चलाने वाली छोटी पार्टियां सब उसको साम्प्रदायिक घोषित कर देंगे | लेकिन यदि कोई सिर्फ मुस्लिम हित की ही बात करेगा तो वो धर्मनिरपेक्ष माना जायेगा | यहाँ मैंने "सिर्फ" इसलिए लिखा है क्योकि ओबैसी ने आजतक संसद मे सिर्फ मुस्लिम हित और मुस्लीमों के बारे मे ही मुद्दे उठाये है और सिर्फ मुस्लिम लोगो की ही मदद करते है यहाँ तक आसाम मे भी जो उन्होंने रिलीफ कैम्प लगाया उसके उपर लिख दिया " only for muslims" इन्होने सानिया मिर्जा को कई बार सम्मानित किया लेकिन जब एक पत्रकार ने इसने पूछा कि आप सानिया नेहवाल को कब सम्मानित करेंगे तो ये माइक फेक दिये |

मित्रों, आंध्रप्रदेश की कांग्रेस सरकार की ही आईबी हैदराबाद मे भडके कई दंगो के लिए ओबैसी बंधुओ को जिम्मेदार बताती है यहाँ तक की केन्द्र की ख़ुफ़िया एजेंसियों ने भी कई बार गृहमंत्रालय को ओबैसी के संदिग्ध गतिबिधियों के बारे मे चेतावनी दी है | लेकिन सब बेकार |

सोचिये क्या राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी नरेंद्र मोदी या तोगड़िया या अशोक सिंघल जी के साथ फोटो खिचवा सकते है ? नही क्योकि ये लोग तो हिन्दुवादी है और भारत मे हिन्दुवादी होना सबसे बड़ा अपराध है |


लेकिन वहीराहुल गाँधी और सोनिया गाँधी ओबैसी के साथ कई कई घंटो तक बैठते है और उसके साथ फोटो खिचवाते है | क्योकि सोनिया ने जो काला कानून "साम्प्रदायिक हिंसा निवारण बिल" बनाया था उसके अनुसार तोसिर्फ हिंदू ही दंगाई होते है, हिंदू हिंसक होते है और हर बार सिर्फ हिंदू ही पहले दंगे भड़काते है |


मित्रों, सबसे बड़ा सवाल ये है कि भारत की मीडिया और कांग्रेस की हिन्दुओ के बारे मे इस दोगली मानसिकता का जिम्मेदार कौन है ? 

मित्रों, इसके जिम्मेदार हम सब हिंदू  खुद ही है | ये हम हिंदू ही है जो सब कुछ जानते समझते हुए भी जतिपति और दूसरे छोटे छोटे मुद्दों और कांग्रेस के द्वारा दिये गए झूठे लालचो और प्रलोभनों के बहकावे मे आकर इस कांग्रेस को वोट देकर इसे मजबूत करते है | हिंदू मित्रों, अपने बारे मे तो नही कम से कम पचास साल बाद आने वाली अपनी हिंदू पीढियों के बारे मे सोचो | जो हाल पाकिस्तान, सीरिया, लेबनान, इंडोनेशिया, फिलीपींस और भारत मे कश्मीर, केरल और आसाम मे हिन्दुओ के साथ हुआ है और जो आज हिंदू इन जगहों पर पर अत्याचार झेल रहे है वही आज के पचास सालो के बाद पूरे भारत मे झेलेंगे |

           

                     जय हिंद !!! जय भारत !!! वन्देमातरम !!

क्या आप सेक्युलर है ? Are you a secularist? -१


१.   -  विश्व में लगभग ५२ मुस्लिम देश है, क्या कोई एक भी मुस्लिम देश है जो हज सब्सिडी देता है ?

२.   -  क्या एक भी मुस्लिम देश है , जहाँ हिन्दुओ का विशेष अधिकार है जैसा मुस्लिमो को भारत में दी जाती है ?

३.    -  एक भी मुस्लिम देश है जिसका राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री गैर मुसलमान हो ?

४.     -  बताए कि किसी एक मुल्ला या मैलावी ने आतंकवादियों के खिलाफ “ फतवे “ घोषित किये हो ?

५.     -  हिंदू बहुल बिहार, महाराष्ट्र केरल, पांडिचेरी आदि के मुख्यमंत्रियों के रूप में मुसलमान निर्वाचित है| क्या कभी एक हिंदू, मुस्लिम बहुल जम्मू और कश्मीर या ईसाई बहुल नागालैंड/मिजोरम के मुख्यमंत्री बनाने कि कल्पना कर सकता है ?

६.    -  मंदिरों के फंड मुसलमानों और ईसाईयों के कल्याण केल्लिये क्यों खर्च किया जाता है ? जब कि वे अपने पैसा मुक्त रूप से कही पर खर्च कर सकते है |

७.     -  क्यों गांधी जी ने खिलाफत आंदोलन (हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के साथ कुछ नहींका समर्थन किया है और क्या वह बदले में मिल गया?

८.    -  क्यों गाँधी जी ने कैबिनेट के निर्णय पर आपत्ति जताई की सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण सार्वजनिक धन से नही किया जायेगा ? जब कि १९४८ में नेहरू और पटेल को सरकारी खर्च पर दिल्ली के मस्जिदों के नवीनीकरण के लिए दबाव बनाया |

९.   - यदि मुसलमान और ईसाई महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि में अल्पसंखयक है तो हिंदू जम्मू और कश्मीर, मिजोरम, नागालैंड, अरुणांचल प्रदेश, मेधालय आदि में क्यों नही अल्पसंख्य है ? हिन्दुओ को इन राज्यों में अल्पसंख्य का अधिकार क्यों नही दिया जाता है ?

१०- घोधरा कांड को आंधी तूफ़ान कि तरह जब नही तब उडाया जाता है | जब कश्मीर से ४ लाख हिन्दुओ का सफाया किया गया | इसकी याद क्यों नही आती है ?

११- १९४७ में, जब भारत का विभाजन हुआ तो पाकिस्तान में हिन्दुओ कि जनसँख्या २४ % थी \ आज १% के बराबर नही है | पूर्वी पाकिस्तान ( बंगलादेश) में हिन्दुओ कि जनसँख्या ३०% थी, आज लगभग ७% है | लापता हिन्दुओ का क्या हुआ ? क्या हिन्दुओ के लिए मानवाधिकार नही है ?

१२- .  इसके विपरीत, भारत में मुस्लिम जनसँख्या १९५१ में १०.४% थी और आज १८% से ऊपर है | जबकि हिंदू कि जनसँख्या ८७.२०% थी जो २०११ में ८०% रह गयी है | क्या किसी राजनीतिक ने मुसलमानों से परिवार नियोजन के बारे कहा है ?

१.   -  क्या आप समझते है कि – संस्कृत सांप्रदायिक है और उर्दू धर्मनिरपेक्ष है ?, मंदिर सांप्रदायिक है और मस्जिद धर्मनिरपेक्ष है ?, साधू सांप्रदायिक है और इमाम धर्मनिरपेक्ष है ?, भाजपा सांप्रदायिक है और मुस्लिम लीग धर्मनिरपेक्ष है ?, वन्देमातरम सांप्रदायिक है और अल्लाह-हो-अकबर धर्मनिरपेक्ष है ?, श्रीमान सांप्रदायिक है और मियां धर्मनिरपेक्ष है ?, हिंदू सांप्रदायिक है और इस्लाम धर्मनिरपेक्ष है ?, हिंदुत्व सांप्रदायिक है और जिहादवाद धर्मनिरपेक्ष है ? और अंत में, भारत सांप्रदायिक है और इटली धर्मनिरपेक्ष है ?
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२.    - जब ईसाई और मुस्लिमो के स्कूलों में बाईबल और कुरान सिखाया जाता है तो हिन्दुओ के स्कूलों में गीता और रामायण क्यों नही सिखाया जा सकता है ?

३.    - अब्दुल रहमान अंतुले को प्रसिद्द सिद्धि विनायक मंदिर प्रभादेवी मुम्बई का  ट्रस्टी बनाया गया था | क्या एक हिंदू ( खासकर मुस्लायम या लालू ) कभी मस्जिद या मदरसा के ट्रस्टी बन सकते है ?
४.      - डॉ. प्रवीण तोगडिया को कमजोर आधार पर कई बार गिरफ्तार किया गया है | क्या जमा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी को जो आईएसआई होने का दावा और भारत विभाजन की वकालत करने वाले को कभी गिरफ्तार किया गया है ?

५.  - जब हज यात्रियों को सब्सिडी दी जाती है  तो हिंदू को अमरनाथ और कैलाश मानसरोवर तीर्थ यात्रा के लिए टैक्स क्यों ?

शेष अगले पोस्ट में ....


स्वामी विवेका नन्द के नजर में इस्लाम ( swami Viveka Nand about Islam ) - २



४. गैर मुसलमानों कि हत्या :-

“ कोई आदमी जितना अधिक स्वार्थी होता है वह उतना ही अधिक अनैतिक होता है इसी प्रकार जो जाति केवल अपने ही स्वार्थ में लिप्त रहती है, वह सारे विश्व में सबसे अधिक निर्धायी और सबसे अधिक अत्याचारी होता है | ऐसा कोई रिलीजन नहीं हुआ है जो उपरोक्त द्वेशवद से अधिक चिपका हुआ हो जितना कि अरेबियन के पैगम्बर ( मुहम्मद) द्वारा स्थापित रिलीजन “इस्लाम” और अन्य कोई ऐसा रिलीजन ऐसा नहीं है जिसने इतना खून बहाए और जो एनी लोगो के प्रति इतना अत्याचारी रह हो | कुरान में एक उपदेश है “जो कि मनुष्य इन शिक्षाओ को नही मानता है, उसे मार देना चाहिए, उसे मारना एक दयालुता है “ | इस्लाम में स्वर्ग ( जन्नत), जहां कि अत्यंत सुन्दर ‘हूरें’ और अन्य सभी प्रकार के इन्द्रिय सुखो एवं अमोद – प्रमोद के साधन है, को पाने का सबसे पक्का तरीका “ गैर – मुसलमानों को मार देने के द्वारा है “ जरा इस रक्तपात के बारे में सोचो जो कि इस प्रकार के विश्वासों के परिणामस्वरूप हुए है |”
( १८ नव. १८९६ को लन्दन में दिए गए भाषण से, २०:३५२-५३)


५. एक हाथ में कुरान दूसरे में तलवार :-
“ जरा उन छोटे – छोटे संप्रदायों के बारे में सोचो जो पिछले कुछ सैकड़ो वर्षों से चलायमान मानव मस्तिष्क से उपजे है और वो ईश्वर के समीप अगणित सत्यों के ज्ञान का हेकडबाजी से दावा करते है |
इस मिथ्याभियान् पर जरा ध्यान दीजिए | इससे यही सिद्ध होता है तो यही कि ये लोग कितने अहंकारी है | और इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि ऐसे दावे हमेशा झूठे सवित होते है
और ईश्वर के कृपा से ऐसे दावों का सदैव असत्य होना निश्चित है | इस विषय ( इस्लाम ) में मुसलमान सबसे अलग थे |उन्होंने आगे बढ़ाने का प्रतेक कदम तलवार कि धार से आगे बढ़ाया यानी कि एक हाथ में कुरान और दूसरे में तलवार, “ कुरान स्वीकार करो या मौत” इसके अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है “ तुम इतिहाश से जानते हो कि इससे उनकी कितनी आश्चर्यजनक सफलता रही है| छह सौ वर्षों तक उन्हें कोई नहीं रोक सका और इसके बाद एक समय ऐसा आया जब उन्हें चिल्ला कर कहना पड़ा कि रुको | अन्य रिलिजनो के साथ भी ऐसा ही होगा, यदि वे ऐसे ही तरीके अपनाएंगे |
( २८ जन. १९००, पाड्सेना कैलिफोर्निया में दिए गए भाषण से, ‘ १: ६९*७०)


६. सार्वभौमिक भाईचारा सिर्फ मुसलमानों के लिए :
“मुस्लमान विश्व व्यापी चयिचारे कि बात करते है परन्तु वास्तव में इसका मतलब क्या है ? आखिर जोकि मुसलमान नहीं है वह इस सार्वभौमिक भाईचारे में सम्मिलित क्यों नहीं किया जायेगा ? उसके तो गले काटे जाने कि संभावना अधिक है |” ( २:३८०)

७. मुसलमान मूर्तियों कि जगह कब्रों को पूजते है :-
“ मुसलमान प्राय: मूर्तियों कि जगह अपने पीरों और शहीदों कि कब्रों का उपयोग करते है ( यानी पूजते है )|” ( ३: ६१)

८. बालक रूप में ईश्वर :
“ मुसलमान द्वारा ईश्वर को एक बच्चे के रूप में होने के विचार को स्वीकार करना असंभव है | वे इसे मानाने से यह भय्संहित संकोच करेंगे | लेकिन ईसाई और हिंदू इसे आसानी से अनुभव कर सकते है | क्योकि उनके मत में बाल स्वरुप जीसस और बाल रूप श्री कृष्ण कि अवधारण है “| ( ३:९६)

शेष अगले पोस्ट में ....

स्वामी विवेका नन्द के नजर में इस्लाम ( swami Viveka Nand about Islam ) - १

१. मुहम्मद कि शिक्षाओ के कारण लाखो लोग मारे गए  : -  
"यदि तुम कुरान को पढ़ो तो तुम्हे सबसे आश्चर्य सत्य और अंधविश्वास मिले जुले मिलेंगे | तुम इनकी व्याख्या कैसे करोगे ? निःसंदेह वह पुरुष ( पैगम्बर मुहम्मद ) अंत प्रेरित था | लें ऐसा प्रतीत होता है कि वह अंत प्रेरणा मानो उसपर थोपी गयी है | वह कोई एक प्रशिक्षित योगी नहीं था और वह जो कुछ कर रहा था वह उस सबका कर्ण भी नहीं जनता था | सोचो उस भलाई का जो मुहम्मद ने विश्व के लिए कि और उस महान बुराई को भी सोचो जो कि उसकी हठ धर्मिता के कारण कि गयी | जरा सोचो कि उसकी शिक्षाओ कारण लाखो मनुष्यों कि सामूहिक हत्याए हुई, मांओ को अपने बच्चो को मौत के कारण खोना पड़ा, बच्चे अनाथ बनाये गए, अनेक देश सम्पूर्ण नष्ट हो गए, लाखो ही लाखो कि हत्या कि गयी |"
( १ : १८४ )




२. मुसलमानों के कर्मकांड : - 


"प्रतेक मुसलमान जो यह सोचता है कि एक गैर - मुसलमान का प्रतेक कर्मकांड, प्रतेक आराध्य स्वरुप, प्रतेक मूर्ति एवं प्रतेक धार्मिक अनुष्ठान पापपूर्ण है, मगर वह ऐसा नहीं सोचता जब वह अपने ही धर्म स्थल काबा पर आता है इस सन्दर्भ में हर एक धार्मिक मुसलमान को, वह जहा कही भी उपासना करे उसे यह सोचना आवश्यक है कि वह काबा के सामने खडा है ( इसीलिए विश्व के सारे मुसलमान मक्का कि ओर मुह करके नमद पढते है ) | जब वह वहाँ कि यात्रा करे तो उसे धर्म स्थल कि दिवार में लगे " संगे-अस्वद" ( काले पत्थर को चूमना चाहिए | मुसलमानों का विश्वास है कि वे सभी चुम्बनों के निशानो जो कि लाखो ही लाखो मुसलमानों ने उस पवित्र पत्थर पर किये गए " आखिरात" यानि न्याय के दिन पर उस धार्मिक व्यक्ति के कल्याण के लिये उठ खड़े  होंगे | इसके अलावा वहाँ एक जिमजिम का कुआ है | मुसलमानों का विश्वास है कि जो कोई थोडा भी पानी उस कुए से निकालेगा उसके सभी पाप क्षमा कर दिए जायेंगे और 'कियामत' के दिन के बाद उसे एक नया शारीर मिलेगा तहत वह सदैव रहेगा |" ( २: ३९)




३. गैर मुसलमानों को जान से मारो :- 


"मुसलमानों को उन सभी लोगो को जान से मारने कि अनुमति देता है जो कि उसके मत के नहीं है यानि कि गैर - मुसलमान है | कुरान में यह साफ़ लिखा है कि "गैर मुसलमानों कि हत्या करो यदि वे मुसलमान नहीं बन जाते है |" उनको आग में जला देना और तलवार के घात उतार देना चाहिए |" ( २:३३५)


शेष अगले पोस्ट में ......

आतंकवाद का कारण है इस्लाम



जो मुसलमान कहते हैं इस्लाम तो शांति का मजहब है वे यह बताए कि जब सारी दुनिया के मुसलमान इन बातों पर सहमत हैं कि इस्लाम ही एकमात्र सच्चा धर्म है http://www.islamhouse.com/p/289311 तो शांति कैसे आ सकती है ? अब वे यह बात क्यों कहते हैं या तो वे इस्लाम के मूल सिद्धान्त को नहीं जानते या फिर वे हिन्दुऒं को मूर्ख बनाने के लिए एसा कहते हैं । अन्य धर्मावलम्बयों को इस्लाम की शांति समझाने से पहले वे स्वयं आपस में एकमत हो जाएं । भारत के मुसलमानों को इस फतवे का जवाब देना होगा व यदि नहीं देते तो फतवे को ठीक मानकर हिन्दुऒं को जिहाद का जवाब देने के लिए तैयार हो जाना चाहिए । यह फतवा सभी सेक्यूलर कहलाने वाले नेताऒं के मुंह पर तमाचा है । इसे पढ़ने के बाद वे किस मुंह से इस्लाम की तरफदारी करेंगे? हिन्दुओं की मूल समस्या यह है कि वे जैसे स्वयं हैं इस्लाम व ईसाइयत को भी उसी श्रेणी में रखते हैं और इसी कारण वे आज तक इसलाम के हाथों मार खाते रहे हैं । :
उक्त फतवे से यह स्पष्ट हो गया है कि मुसलमान किसी भी देश में अन्य धर्मावलम्बियों के साथ नहीं रह सकते हैं । सऊदी आरब की साइट इस्लाम हाउस में एक फत्वा इसी विषय पर लिया गया है । विषय है

‘‘ क्या अन्य धर्मों की इस्लाम के साथ एकता स्थापित की जा सकती है ।”

इस फतवे को पढ़कर समस्त देशवासी जवाब दें कि क्या इस्लाम व मुसलमानों से कुरआन व शरीयत में एसी खतरनाक बातों के रहते विश्वास किया जा सकता है ? मुसलमान जवाब दें कि इनमें कौन सी बात वे भारत के मदरसों में नहीं पढ़ाते हैं ? क्या उन्होंने कुरआन व हदीस को संशोधित करके पढ़ाना शुरू कर दिया है ?यदि नहीं तो वे हिन्दुऒं के किसी भी प्रतिकार पर शोर मचाना बंद कर दें क्योंकि यह संविधान

सावधान ! भारत का इस्लामीकरण हो रहा है ?


हमरे देश कि राजनीती इतनी गिरे हुए स्तर तक पहुच गयी है कि दुनिया के देशों में सर्च लाईट लेकर भी खोजा जाय तो भी नही मिलेगा | जहाँ पर आम जनता को अपनी अस्तित्व के लिए लड़ाई लड़ने को मजबूर किया जा रहा है, वही दूसरी तरफ देश कि एक बड़ी राजनीतीक पार्टी समाज के एक वर्ग के तुष्टिकरण में लगी हुई है |
·       क्या होगा हमारे देश का ? ये भविष्य के अंधकार में खोया हुआ है ! अगर हम उस भविष्य के अँधेरे में कुछ देखने की कोशिश करते है तो, आज से एक अलग भारतीय समाज की धुधली झलक नजर आ रही है | जहाँ भारत के बहुत से राज्यों का मुस्लिमकरण हो गया है, सरकारी इमारतों पर पाकिस्तानी जैसे झंडे लहरा रहे है | आज के तथाकथित सेक्युलर नेता इस्लाम धर्म अपना कर अपने – अपने हरम में जन्नत का आनंद ले रहे है | और बचे हुए कुछ राज्यों में ये सेक्युलर नेता खून की होली खेलवा रहे है | पकिस्तान जिंदाबाद – पकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगा कर जन्नत की सीढियाँ चढ रहे है | आम जनता भी अपनी आत्म सम्मान की रक्षा करने के लिए जान की बाजी लगा रही है | शेष भारत के गलियों मुहल्लो में भोपू बजवा कर आम जनता को सन्देश दे रहे है कि “ हमें भी मुस्लिम बन कर, शेष भारत का इस्लामीकरण कर देना चाहिए | क्योकि अल्लाह बहुत दयालु है |
आखिर कहा खो गयी है हमारे देश कि राजनीति ? हमारे देश के नेता धर्म के नाम पर देश को बाट रहे है| प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कि ही बात लीजिए, इन्हें तो सच्चे, ईमानदार नेता कहते है लोग, मगर ये भी तुष्टिकरण कि राजनीती में लगे पड़े है | इनका ये वाक्य कि “ हमारे देश के संशाधनो पर पहला हक मुसलमानों का है “| मै कहता हूँ कि “क्या हिंदू, सिख, ईसाई, फारसी, जैन, बौद्ध क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के खेतों में जाकर घास छिलेंगे और मुसलमान सब संशाधनों का पहले उपयोग करेंगे| अगर मुसलमानों से कुछ संशाधन बचा तो मनमोहन सिंह के कृपा से शेष धर्मों के लोग उपयोग करेंगे| लानत है ऐसे मनमोहन सिंह पर जो कुर्सी के लालच में अपना आत्म सम्मान  तक इटली के राजकुमारी के आगे गिरवी रखा दिया | इसकी तुलना एक निरीह जानवर से भी कि जाय तो कम है जो अपनी आत्म सम्मान के लिए जान कि बाजी तो लगा देता है | मनमोहन सिंह एक सच्चे, ईमानदारी का तमगा लिए है मगर उनके पास आत्म -सम्मान नाम कि कोई चीज ही नही है | अगर जरा भी आत्म सम्मान होता तो ऐसे वाक्य बोलने से पहले सौ बार मर चुके होते, फिर भी ये वाक्य जुबान से बाहर नही निकलती |
एक सच्चे, ईमानदार प्रधानमंत्री कि गैर लोकतांत्रिक बयांन से क्या समझा जाय ? अगर ये वाक्य कांग्रेस का कोई लुच्चा नेता ( दिग्विजय सिंह ) कहा होता तो आम जनता लुच्चे की लुच्चई समझ कर सुन लेती | मगर यह वाक्य हमारे देश के प्रधानमंत्री जी बोले है तो कुछ न कुछ तो सोचना ही पड़ेगा ? कि दाल में काला है कि पूरी दाल ही काली है ?
जरा ध्यान से सोचा जाय तो ! मनमोहन सिंह ने ऐसा वयान क्यों दिया है ? मुस्लिमो को खुश करने के लिए ? अगर मुस्लिम खुश हो जाते है तो क्या होगा ? सच्चाई है कि कांग्रेस का वोट बैंक बढेगा | इससे कांग्रेस को फिर से कुर्सी मिलेगी, कांग्रेस फिर से सत्ता में आजायेगी (?) | अब मनमोहन सिंह (चाहते हुए भी अब प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे ) काश्मीर को मुस्लिम देश बनाने के लिए कहेंगे कि “ कश्मीर के मुसलमानों ने बहुत संघर्ष किये है | ६०००० हिन्दु पंडितो से पाकिस्तान कि सहायता से कश्मीर को खाली करने में बहुत मेहनत किये है, हिंदूओ के खून से कश्मीर कि घाटी को लाल रंगीन बनाया है, कितना मेहनत किया है मुस्लिम बेचारो ने | इन्हें इनकी बहादुरी पर बतौर कश्मीर को इस्लाम देश घोषित कर ही देना चाहिए | ताकि राहुल गाँधी से लेकर गाँधी परिवार के आने वाले वारिसों को कम से कम सात – आठ पुस्तो तक मुसलमानों का वोट मिलता रहे और भारत कि गद्दी पर बिराजमान रहे, जैसे जवाहरलाल नेहरू ने किये थे कश्मीर में धारा ३७० का प्रावधान करके |
शेष अगले पोस्ट में ..........

अल्लाह हमें रोने दो - एक मुस्लिम औरत की व्यथा ( स्वयं उसी के शब्दों में ) ;- लेखिका - जहांआरा बेगम

ओ अल्लाह तुम तो हमें अकेले में चीखने दो और जोर जोर से रोने दो । कहीं एकान्त में हमारा दम ही न निकल जाए । बुरके की घुटन में लोक जीवन की चारदीवारी में हमें इतना जी भर के रो लेने दो कि हमारी आखों में एक भी आंसू बाकी न बचे । हमें इतना रोने दो कि उसके बाद रोने की ताकत ही न रहे । क्यों केवल एक ही अधिकार तुमने मुसलमान महिलाओं के लिए छोड़ा है । पूरे मुस्लिम संसार में उलट पुलट हो रहे हैं पर हम मुसलमान तो वही पुराने ढर्रे पुराने संस्कारों की बेड़ियों में जकड़े हुएहैं । पूरे संसार की नारियों के लिए मुक्ति आंदोलन चले और आज वह स्वतंत्रता के मुक्त वातावरण में सांस ले रही हैं । परन्तु वाह रे हमारा भाग्य! मुस्लिम समाज की महिलाओं की मुक्ति का एक भी स्वप्न संसार के किसी कोने से नहीं फूटा । हमारी मुक्ति के लिए कोई भी समाज सुधारक, चिन्तक, कोई नेता व कोई भी धार्मिक व्यक्ति आगे नहीं आया । या अल्लाह ! कितना अदभुत है हमारा मुस्लिम समाज जिसमें कोई शरत चन्द्र पैदा नहीं हुआ जो हमारे आसुंओं का हिसाब चुकता कर दे । बदरूद्दीन तैयबजी, हमीद दलवई आदि प्रसिद्ध विद्वानों ने गो हत्या बंद हो इस पक्ष में निबंध लिखे परन्तु हमारे लिए सहानुभूति का एक भी अक्षर हलक से नहीं फूटा । अब्दुल जब्बार ने हिजड़ों के दुख के बारे में तो एक मोटी पुस्तक लिख डाली परन्तु हमारे लिए एक भी शब्द उनके शब्दकोष से नहीं फूटा । सैय्यद मुस्तफा सिराज ने तो लिख ही डाला कि हिन्दू समाज अपने लोगों के दोषों और त्रुटियों को लेकर स्वतंत्रता पूर्वक लिख सकते हैं परन्तु हम लोग अपने समाज के बारे में लिखने से डरते हैं । हमारे विचारक भी मुस्लिम मुल्ला , मौलवियों से डरे हुए , सहमें हुए से एक शब्द भी नहीं कह पाते । खासतौर से एक मुस्लिम विवाह कानून को लेकर अगर कुछ ने लिखना भी शुरु कर दिया जैसे कि नरगिस सत्तार साहब की हमें आषा की एक किरण फूटती सी दिखाई तो दी पर अफसोस ! उसके वाद फिर वही घोर अंधकार , गहरी काली स्याही व एक लंबी चुप्पी । पिछले कई सालों से संसार के कई हिस्सों में कई परिवर्तन हुए । विवाह कानून में कई तब्दीलियां हुई कई नई वैज्ञानिक खोजों और चिन्तनों ने पुराने रूढ़ियों को छोड़ने को मजबूर कर दिया लेकिन मुस्लिम समाज वही पुरानी रूढ़िवादियों मे अटका हुआ है । लाहौर में सहस्रों स्त्रियों महिला कानून विदों ने जब मुस्लिम महिलाऒं के अधिकारों को लेकर जुलूस निकाला तो पुरूष पुलिस ने भयंकर लाठी चार्ज करके उसे भंग कर दिया । एक बार भारत की पारलियामैन्ट में मुस्लिम महिलाऒं के अधिकारों को लेकर डीबेट रखी गयी। ए डी एम के की पार्टी के मुस्लिम सांसदों द्वारा इस प्रश्न को उठाया गया पर मुस्लिम वोट खो देने के भय से देश की सब राजनैतिक पार्टियों को सांप सूंघ गया । सबके सब गूगें बहरे हो गए । क्या अजीब जीव है अल्लाह ? यह राजनैतिक पार्टी के नेता व कार्यकर्ता । ऐसा लगता है जैसे इन सबकी जुबान को लकवा मार गया हो । 

ओ अल्लाह ! यह राजनैतिक पार्टियों के नेता और कार्यकर्ता सुल्तानों के बनाए हुए खोजीयों हिजड़ों से भी नीच व निकृष्ट जीव हैं । खोजी लोग वह होते थे जो सुल्तानों द्वारा उनकी काम वासनाओं को पूरा करने के लिए सुन्दर स्त्रियों के बीच रहते हुए भी उनका भोग नहीं कर सकते थे । उन सुंदर स्त्रियों को देख कर वह मजबूरी में मन मसोस कर रह जाते थे क्योंकि हरम की स्त्रियों को बुरी नजर से देखना उनकी मौत का न्यौता देने के बराबर होता था । ऐसे ही आज के नेता केवल दिखावे के लिए समाज सुधारक बनते थे अन्दर से उनकी निगाहें स्त्रियों के बदन को निहारती रहती है । यदि वे मुस्लिम स्त्रियों कि उत्थान की बात भी करते हैं तो केवल छलावा मात्र होता है । करके दिखाने की शक्ति उनमें नाम मात्र की भी नहीं होती है । इसलिए आज मुस्लिम स्त्रियों का आकुल क्रंदन चालू है । और शायद युगयुगान्तर तक रहेगा । यह राजनैतिक तुच्छ जीव ऊंची आवाज में मधुर मधुर सुन्दर महान शब्दों मे स्वाधीनता , साम्यता व समान अधिकारों जैसे शब्दों का प्रयोग तो करते हैं परन्तु वह वोटों के लालची मुस्लिम स्त्रियों के उत्थान में एक एक भी पग नहीं उठाते । वाह कितनी सुन्दर शब्दावली का प्रयोग करते हैं मानों आज ही मुस्लिम स्त्री समाज की नैया पार लगा देगें । परन्तु उनके भाग्य में तो आंसू के दरिया में डूबना ही लिखा है । आंसू ही उनका भाग्य है जैसे संसार का तीन हिस्सा पानी है और एक हिस्सा पृथ्वी है ऐसा ही मुस्लिम समाज की महिलाओं का जीवन गर्दन तक आंसुओं में डूबा है । हिम्मत तो देखिए पुरूष समाज का ८० वर्ष का शेख कांपते हुए सिर वाला डगमगाते हुए कदमों वाला घर में ५ बीबियां होते हुए भी भारत में आ रहा है केवल १३, १४ वर्ष की लड़की से विवाह रचाने और वह लाचार लड़की पुरुषों द्वारा संचालित समाज में न चाहते हुए भी बूढ़े खूंसट के साथ अरब देश में पहुंच जाती है । इस प्रकार की दिल दहला देने वाली घटनाओं । आए दिन समाचार पत्रों में पढ़कर मुस्लिम महिलाओं की रूह कांप जाती है पर बेचारगी पर आंसू बहाने के सिवाय उनके पास कोई चारा नहीं । मुस्लिम महिला की घुटन भरी जिन्दगी ऐसी खबरों को पढ़ कर घर के अन्धेरे कोनों में सुबक कर रोने में ही बीत जाती है । कोई एक भी तो उनकी नहीं सुनता उनकी सिसकियों भरी आवाज । न घर में न घर के बाहर न भाई न पिता न मस्जिद न मुल्ला मौलवी न नेता न समाज सुधारक सब के सब मौन । कोई भी तो मौलवी ऐसी घटना के विरुद्ध फतवा जारी नहीं करता । उल्टा पाशविक धार्मिकता की आड़ में स्त्री तो पुरुष के पांव की जूती, बच्चा पैदा करने वाली मशीन पुरुष की भोग्या ऐसी धारणाओं की बलिवेदी पर परवान हो जाती है । चार पांच सौतों के साथ जीवन कितना नारकीय बन जाता है यह तो केवल भोगने वाला ही जान सकता है । किसी मौलवी का जिहाद ऐसी कुप्रथा के विरुद्ध क्यों नहीं चलता उल्टा मुल्ला साहिब इसको मुता विवाह का नाम देकर अपना धार्मिक कर्मकाण्ड करता है । यह मुता विवाह है क्या ? केवल थोड़े समय के लिए शादी फिर तलाक तलाक तलाक । असंख्य अस्वस्थ रहन सहन, दारिद्रय, अशिक्षा ने हमारे समाज को उजाड़ बना दिया है । भेड़ बकरी और जानवरों के समान हमारी जिन्दगी, बीबियों के बीच प्रायः धक्का मुक्की, केश केशी व जूतमपैजार होती ही रहती है । मियां साहब अगर घर में हो तो बात ही क्या ? दोनों की ही ढोर ( जानवरों ) के समान पिटाई होती है । और उसके बाद तीसरी को लेकर मियां साहब दरवाजा बन्द करके अपने सोने वाले कमरे में पहुंच जाते हैं । हे अल्लाह ! ऐसा कैसा जीव बदा है तुमने हमारे लिए ।
प्रेम , तो हमारे जीवन में कभी आता ही नहीं है । प्रकाश की एक किरण कभी देखी नहीं । प्यार का उदाहरण तो बेगम मुमताज में ही देख पाते हैं जिसकी याद में अपूर्व शिल्पकला युक्त ताजमहल शाहजहां ने बनवाया था । उसी बेगम की मृत्यु तेरह संताने पैदा करने के बाद, जब संतान धारण करने के ताकत न रहने के बाद भी गर्भधारण करना पड़ा तो अंतिम संतान के जन्म में मौत के आगोश में सो गयी । यह है मुस्लिम बादशाह के प्यार का अनोखा ढंग । अब तुम ही बताओं ऐ अल्लाह ! जहां शहजादियों के प्रेमी या प्यारी बेगमों की यह हालत है तो हम जैसी साधारण मुस्लिम महिलाओं का तो कहना ही क्या ? हमारे प्यार के पैमाने को तुम ही नाप सकते हो अल्लाह ! तलाक वाली तीखी धार तलवार महिलाओं के सिर पर कब आ गिरे कुछ कहा नहीं जा सकता, अगर कही पान में चूना लगाने में तनिक देरी हो जाए तो तलाक की तलवार से कब कत्ल होना पड़े कुछ भरोसा नहीं । मियां जी की मन की मौज उनकी मर्जी से मजाक में भी तीन बार तलाक कह देने से सालों साल का विवाहित जीवन कब बिखर जाए कुछ कहा नहीं जा सकता । ऐसे तलाक का परिणाम छोटे बच्चे मां के प्यार से विहीन, नन्हें मुन्ने बिलखते हुए बच्चे, स्वास्थ्य से रहित उपेक्षा व अनादर का जीवन जीते जीतेकब आतंकियों की जमात में चले जाते हैं पता ही नहीं चलता । अन्य समाजों मे ऐसा नहीं होता यह बात नहीं है पर धर्म के नाम पर वहां ऐसा नहीं होता । मौलवी लोग मियांओं को इस प्रकार का उपदेश देते हैं कि बच्चे पैदा करके फायदा उठाओ, संख्या बढ़ाओ और देश व्यवस्था में अव्यवस्था फैलाओ । पर अल्लाह ! उनके पागलपनें की धुन को सहन करते हैं हम मां बनकर । विवाहित मुस्लिम स्त्री कभी खाली नहीं रहती या तो गोद में या गर्भ में एक न एक बच्चा रहेगा । शीलहीन, स्वास्थ्यहीन होकर विचित्र जिन्दगी जीनी होती है उसे हम लोग पड़ोस में ही हिन्दू नारियों की जिन्दगी देखते ही रहते हैं । अहा ! कितनी पवित्रता, शुचिता, प्रेम और विश्वासपूर्ण जीवन जीती हैं । पर हमारे जीवन में पवित्रता, व सतीत्व के अवसर ही कहां हैं ? तलाक के बाद अगर मियां जी को पश्चाताप हो तो घर में बीबी को रख नहीं सकते क्योंकि इस्लाम की शरीयत का पंजा अड़ाकर मौलवी लोग मार्ग अवरुद्ध कर देगें । यदि वह लड़की वापिस अपने पति के पास लौटना चाहे और पति रखनाचाहे तो एक नयी यातना झेलनी होगी । फिर एक दूसरे मियां के साथ शादी रचाए, उस शादी के तीन दिन व तीन रात घृणामय दाम्पत्य जीवन बिताने के बाद वह महिला पवित्र होगी व कुवारी मानी जाएगी । फिर यदि वह मियांजी कृपा करके तलाक की भीख देगें तो ही पूर्व पति उसे ग्रहण कर सकता है । अगर कहीं लड़की खुदा की दया से सुंदर हो तो बहुतों का मन बदल जाता है और तलाक नहीं देते और परिणामस्वरूप खूना खानी तक हो जाती है । ऐसा है हमारा जीवन । ओ अल्लाह ! किसे कहें ? किससें बोले अपनी व्यथा ? यदि विवाह करें तो भंयकर सजा मिले, शिकायत करें तो मुखालफत ।
इस पृथ्वी के समस्त धर्मों में कौमार्य, ब्रह्‌मचर्य , पवित्रता आदि की मान्यता है परन्तु हमारे यहां नहीं, । हमारे समाज में बहुशिक्षित मुसलमान तो हैं और इन बातों को वे जानते भी हैं परन्तु मजा लूटने के लोभी वे भी है इसीलिए कोई भी इसके विरोध में कुछ नहीं कहता । अधिक आधुनिक शिक्षित जो हैं वे हिन्दू समाज के आसपास चक्कर काटते रहते हैं वे भी हमारी सुध लेने की जरूरत नहीं समझते शायद इससे ही हमारी तरफ देखकर काजी अब्दुल ओद्ध ने एक बार कह डाला कि चौदह सौ वर्षों के इतिहास में इस्लाम मानव सभ्यता के अन्धकार में एक छोटा सा चिराग भी न जला सका और आबू सय्‌यद समग्र जीवन रवीन्द्र की चर्चा करते रह गए । इसी प्रकार एमसी छागला , उपराष्ट्रपति हिदायतुल्लाह, सिकन्दर बख्त, डा. जिलानी, सैय्‌यद सुजतबा अली आदि जो हमारे समाज में मनुष्यता में श्रेष्ठ हुए वे सब इस मुस्लिम समाज से किनारा करते मुक्त हिन्दू समाज के निकट ही रहने लगे । इसी कारण हम मुस्लिम महिलांए मुल्ला मौलवी के शासन के अधीन अन्धकार भरा जीवन जीते हुए, भर्राए हुए ह्‌रद्य सेरुदन भरा व असहनीय यातनाओं भरा जीवन जीने के लिए रह गयीं । कोई साहित्यकार अथवा पत्रकार हमारे जीवन के कष्टमय अन्त स्थल में नहीं झांक सका, कोई हमारे दुखद आसुंओं को नहीं देख पाया, किसी ने कोई किस्सा कहानी या निबन्ध नहीं लिखा । भारत सरकार ने हमें वोट देने का अधिकार तो दिया परन्तु हमारी सुधि लेने के लिए कोई कार्य नहीं किया जिससे हमारा जीवन शांति से व्यतीत हो सके । हिन्दू नारियों के लिए हिन्दू कोड बिल पास करके उनको सुख पूर्वक रहने का अधिकार मिल गया पर हमारे लिए कुछ भी ऐसा नहीं किया गया । हमारे समाज ने कोई भी तब्दीली मुस्लिम विवाह पद्धति में नहीं की है । मार्क्सवादियों के ऊपर भरोसा था पर उन्होंने भी हमारे लिए कुछ नहीं किया जबकि तजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमानिस्तान आदि देशों में मुस्लिम स्त्रियां मार्क्सवादी शासन में मुक्त हो गयी हैं । अब अरब देशों से आकर कोई शेख उन्हें खरीदने की जुर्रत नहीं कर सकता । कोई भी उन्हें जबरदस्ती बाहर नहीं ले जा सकता । अब वह अत्याधिक बच्चे पैदा करने के बोझ से मुक्त हो चुकी हैं । हर वक्त गर्भ धारण की परिस्थिति से भी वह स्वतंत्र हो चुकी हैं । अब कोई भी मुल्ला उनके जीवन का नियंता नहीं । परन्तु हमारे देश के मार्क्सवादी तो मुल्लाओं के ही वश में हैं । मंसूर हबीबुल्ला जैसे कट्टर मार्क्सवादी भी मुल्लाओं के अधीन मियाओं को प्रसन्न करने के लिए मक्का गए, हज करके हाजी बने ।
हे अल्लाह ! तुमने हमारे लिए कही भी शांति व अवसर का नहीं छोड़ा । हमारे प्रति तुम्हारी सदा ही उदासीनता और उपेक्षा बनी ही रहीं । अनन्त यातनाओं में हमारे दिन व रात बीतते हैं । संसार की सभ्यतांए कई कुप्रथाओं को छोड़कर उन्नति की मंजिल की ओर बढ़ती रहीं पर हम जस की तस वहीं की वहीं बैठी रहीं । यहां तक की हिन्दू समान ने सती प्रथा जैसी वीभत्स प्रथा को समाप्त कर दिया । बाल विवाह व वृद्ध कें साथ विवाह की प्रथा को भी समाप्त करने के लिए कानूनी जामा पहना दिया है । समय के प्रभाव से सभी अमानवीय प्रथाएं समाप्त हो गयी हैं । पर हमारे मुस्लिम महिलाओं के लिए तो कुछ भी नहीं हुआ । हमारे मुस्लिम समाज में भी परिवर्तन तो घटित हुए हैं पर सब पुरुषों की अनुकूलता के लिए ही । ईराक में बसरा के पास एक गांव था जो खोजियों ( हिजड़ा ) युवकों के लिए प्रसिद्ध था । खोजी लोग ज्यादा तर नौजवान किशोर होते थे जो अप्राकृतिक व अमानवीय तरीके से खोजी बनाए जाते थे । इस अवैज्ञानिक प्रक्रिया में में ६० लड़के मृत्यु को प्राप्त हो जाया करते थे । ये खोजी सुल्तान, धनी व बादशाहों के हरम की चौकीदारी किया करते थे ताकि हरम से स्त्रियां भाग न सकें । अब इस कातिल प्रथा का अन्त होचुका है । हम आज भी उसी कत्लगाह में रह रहीं हैं । हमारे समाज के पुरुष आज भी हमारे आंसुओं के प्रति उदासीन हैं । केवल सम्पत्तिका अधिकार देकर समझते हैं कि हमें सब कुछ दे दिया है । कितना बढ़िया है यह सम्पत्ति का अधिकार जबकि हमारा निकाह आज भी अनिश्चित है । यह संपत्ति का अधिकार हमें तलाक से कितनी निजात दिला सकता है । मुस्लिम पर्सनल लॉ के कारण मुस्लिम महिला का जीवन लांछनमय हो गया है । उत्तर भारत के प्रख्यात पत्रकार मुजफ्‌फर हुसैन ने लिखा है तलाक तलाक तलाक के नाम से एक फिल्म हिन्दी भाषा में तैयार हो रही थी हमारे मियांओं ने फिल्म के शीर्षक को लेकर आपत्ति प्रकट की और फिल्म का नाम बदलकर निकाह कर दिया गया । अब आपको बताते है कि फिल्म का नाम बदलने के लिए कौन से कारण बताए गए । मियांओं ने यह कहा कि मानों जब मियांजी फिल्म देख कर घर लौटे और बीवी ने पूछ लिया कि कौन सी फिल्म देख कर आए हो । जवाब में मियां जी ने कहा तलाक तलाक तलाक । तो तीन शब्दों में बीवी का जीवन हलाक हो जाएगा । अजीव तमाशा है फिल्म का नाम भी बताने पर मुस्लिम महिला कष्टमय जीवन बिताने पर मजबूर हो जाएगी ।
ईरान में खुमैनी के शासन में सैकड़ों महिलाओं की हत्या कर दी गयी , उनका अपराध क्या ? केवल खुमैनी के मुस्लिम शासन के विरुद्ध थोड़ी सी जुबान खोलना बस इसी कारण इस्लाम के नाम पर उनको नरकपूर्ण जीवन बिताने पर मजबूर होना पड़ा । सैकड़ों महिलाऒं ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी । क्योंकि इस्लाम में इस्लाम के विरुद्ध बोलने का हक किसी को नहीं है । विष्णु उपाध्याय ने इस घटना के बाबत आजकल समाचारपत्र में लिखा परन्तु आज तक एक भी शब्द मुस्लिम जगत नहीं बोला । यदि अन्य समाज की महिलाओं के साथ बलात्कार होता है तो समाचार पत्र उसकी चीख पुकार से काले को उठते हैं । एक आंधी, एक तूफान, एक हलचल सी मच जाती है ऐसी घटना के विरुद्ध । पर इस्लाम का अर्थ तो शान्ति चुपचाप, खामोशी से सब देखना है । ओ अल्लाह ! तुम ही हमारा करुण क्रंदन सुनो । तुम्हें न कहें तो किसे कहें ? कौन सी दर पर दरवाजा खटखटाएं ? तुमने हमारे लिए कोई सुख का अवसर क्यों न छोड़ा । धनी घर में बेगमें बनें तो असंख्य सौतों के बीच में विलास का साधन बनकर रह जांए । ईर्ष्या और प्रतिद्वदिता का जीवन जिएं । अगर गरीब घर में पहुंचे तो दिन रात जी तोड़, कमर तोड़ मजदूरी और उस पर भी हर साल संतान पैदा करना । पूरे समय गर्भ धारण करना यही हमारे भाग्य में लिखा है । गरीब घर की बेगम बनकर हमारी तकदीर में तलाक की तलवार जिधर भी जाएं लटकी ही रहती है । इस तलाक से हमारे बच्चे भी भिखारी बनकर या अपराधी बनकर दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो जाते हैं । हावड़ा स्टेशन के आस पास ऐसी ही परित्यक्ता महिलांए व उनके बच्चों की भीड़ देखी जा सकती है । वहां पर दाड़ी वाले मुल्ला जी की उपस्थिति भी इसीलिए होती है ताकि वह देखता रहे कि इन महिलाओं व बच्चों ने इस्लाम तो नहीं छोड़ा । उन दाड़ी वाले मुल्ला का उनके स्वास्थ्य से कोई लेना देना नहीं । वह अच्छे इंसान बनते हैं या नहीं उससे भी मुल्ला जी का कोई सरोकार नहीं । हे अल्लाह ! मुस्लिम स्त्रियों की जिन्दगी में दुख, वेदना, हताशा व दरिद्रता के सिवाय कुछ नहीं बचता । उनके पास आंसुओं की सम्पत्ति , चुपचाप सिसकने की इजाजत के सिवा कुछ भी नहीं । इसी से ऐ अल्लाह ! हमें रोने दो , शान्ति से रोने दो , तबतक रोने दो जब तक हम मौत को प्राप्त नहीं होतीं । अल्लाह कृपया हमें अकेला ही छोड़ दो ।



इस्लाम के विद्वानों की दृष्टि में जिहाद - 2

17. अयातुल्लाह खुमैनी (१९०३-८९) ''जिहाद, संघर्ष का बहुआयामी रूप है। वास्तव में यह पूर्ण संघर्ष है और यह बीसवीं शताब्दी के फ़ासिस्ट और कम्युनिस्ट नेताओं की संकल्पना से कहीं अधिक है। इसका अर्थ सशस्त्र युद्ध और लड़ाई है; इसका अर्थ आर्थिक तथा राजनीतिक दबाव के जरिए संघर्ष करना भी है जिसका संचालन प्रचार के माध्यम से, गैर-मुसलमानों का इस्लाम में मतान्तरण करके और गैर-मुसलमान समाजों में घुस करके किया जाता है। जिहाद का अर्थ घोर प्रयास करना है और यह विश्वभर में अथक कार्रवाई की अपेक्षा करता है।'' (जोन लाफ़िन, वही, पृ. १५)।
पेरिस में अपने निर्वासन काल के दौरान खुमैनी ने कहा : ''मजहबी युद्ध का मतलब सभी गैर-मुस्लिम प्रदेशों को जीतना है। इस्लामी सरकार के गठन के बाद ऐसे संघर्ष की अच्छी तरह से घोषणा की जा सकी है.........तब हर स्वस्थ वयस्क पुरुष का फर्ज़ होगा कि वह इस विजय-युद्ध में स्वेच्छा से हिस्सा लें। इस विजय युद्ध का अन्तिम उद्‌देश्य धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक कुरान के कानून को लागू करना है।''
उन्होंने यह भी कहा : ''जो व्यक्ति मुसलमान समुदाय पर शासन करता है, उसके मन में हमेशा अपनी भलाई की अपेक्षा मुसलमानी समुदाय की भलाई मौजूद होनी चाहिए। इसीलिए इस्लाम ने अनेक लोगों को मौत के घाट उतारा है। इस्लामी मसुदाय के हितों की रक्षा के लिए इस्लाम ने अनेक जनजातियों का इसलिए विनाश किया कि वे भ्रष्टाचार की स्रोत थीं और मुसलमानों के कल्याण के प्रति हानिकारक थीं।'' (जोन लाफ़िन, वही, पृ. २३)।


18. काहिरा के विद्वान शेख ज़ाहरा ने यह घोषणा की : ''जिहाद सैनिकों तथा बड़ी संखया में सैनिक बलों की स्थापना तक सीमित नहीं है। इसके अलग-अलग रूप हैं। इस्लामी देशों से लोगों के एक ऐसा मज़हबी दल उदय होना चाहिए जो पूरी तरह से ईमान से लैस हो और वह इंकार कनेवालों पर हमला करने के लिए कूच करें और उनको तब तक निरंतर उत्पीड़ित करता रहे जब तक उनका आवास स्थान हमेशा के लिए यातनागृह न बन जाए।'' जिहाद कभी भी खत्म नहीं होगा।.....यह क़ियामत के दिन तक चलेगा। लेकिन लोगों के एक दल विशेष के सम्बन्ध में संघर्ष उस हालात में समाप्त हो सकता है, जब इसके उद्‌देश्य पूरे हा जाएंगे। समाप्त होने की शर्त दुश्मनों द्वारा लिखित समझौता करके आत्मसमर्पण अथवा इस्लाम के पक्ष में शांति संधि या युद्ध विराम की स्थायी संधि करना है।'' (जोन लाफिन, वही, पृ. २२-२३)।

19. प्रो. आस्मा याकूब,  (कराची विश्वविद्यालय) : ''जिहाद का अर्थ उसकी मौजूदा अवधारणा के अनुसार संगठित संघर्ष, सुधार अभियान अथवा परिस्थितियों विशेष में रह रहे मुसलमानों का मुसलमानों अथवा गैर-मुसलमानों के गैर-मज़हबी और अन्यायपूर्ण शासनों के खिलाफ प्रतिरोध करना है'' (दी जिहाद फिक्शेसन, पृ. २१७)।

20. शेख मुहम्मद-अस-सलेह-अल-उथेमिन  (दी मुस्लिम विलीफ, पृ. २२): ''हमारी यह सम्पत्ति है कि जो कोई इस्लाम के अलावा वतर्तमान में मौजूद किसी अन्य धर्म जैसे यहूदीमत, ईसाईयत और अन्य (हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म आदि) में विश्वास रखता है, वह गैर-ईमान वाला है। उससे पश्चाताप करने के लिए आग्रह करना चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं करता है, तो उसकी धर्मत्यागी के समान हत्या कर देनी चाहिए क्यों वह कुरान को नकारा रहा है।''

21. ब्रिगेडियर एस. के. मलिक (कुरानिक कंसेप्ट ऑफ वॉर, पृ. १४२-१४३) : ''युद्ध (जिहाद) के सम्बन्ध में कुरान का मत बिल्कुल अलग है। कुरान के अनुसार युद्ध अल्लाह के लिए छेड़ा जाता है। इसलिए यह प्रारम्भ से अंत तक 'खुदा की वाणी' के द्वारा ही नियंत्रित होता है। युद्ध के सम्बन्ध में कुरानका दर्शन पूरी तरह से कुरान की विचारधारा से जुड़ा हुआ है.... जिहाद, जो कुरान की सम्पूर्ण रणनीति अवधारणा की मांग है कि राष्ट्र की सम्पूर्ण शक्ति तैयर करके लगा दी जाए, तथा सैन्य शक्ति जिहाद का एक घटक है।''

22. काजी हुसेन अहमद  (अध्यक्ष, जमाते इस्लामी पाकिस्तान) ''जिहाद पूजा है'' (जिहाद फिक्सेशन, पृ. २०९)।

23. प्रो. मुहम्मद अयूब, (मिशीगन स्टेट यूनिवर्सिटी) ने लिखा (जिहाद फिक्ेसेशन, पृ. २१२) : ''बहु-मज़हबी तथा बहु-नस्लीय राजनीति के, जो अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के बहुसंखयक सदस्य हैं, वर्तमान प्रसंग में उनका, गैर-मुसलमानों के खिलाफ, स्वशासन के लिए मुस्लिमों के परंपरागत रूप से लोग प्रिय संघष्र के संदर्भ में जिहाद की बात करना दकियानूसी तो है ही, साथ ही घातक भी है। यह विश्व को पुनः कल्पित दो भागों में बाँटता है जैसे दारूल इस्लाम (इस्लामी राज्य) तािा दारुल हरब (युद्ध क्षेत्र) जिसका वर्तमान राजनीतिक सच्चाई से कोई वास्ता नहीं है। हो सकता है कि पहले कभी किसी काल में ऐसा किया गया हो।''

24. जोनाह विन्टर्स (प्रोफेसर, टोरंटो यूनिवर्सिटी, कनाडा) : ''कुरान में जिहाद के मिलने वाले विभिन्न अर्थों को मोटे तौर पर निम्नलिखित श्रेणियों में रखा जा सकता है। पहला-जिहाद एक निष्ठा है जिसे एक व्यक्ति को अन्य सभी व्यक्तियों के समक्ष दिखानी चाहिए। दूसरा-यह गैर-मुसलमानों का विरोध करने का माध्यम है। तीसरा-यह मुसलमान के रूप में अपना दैनिक जीवन व्यतीत करने का एक निश्चित तरीका है। चौथा-यह जन्नत में प्रवेश की एक पक्की अपेक्षा है। पाँचवा-इसे साधारणतः युद्ध करने का एक पर्याय कहा जा सकता है।'' (दी जिहाद जुगरनौट, पृ. ४९)।

25. इरगम मेहमत केनर तथा एमिर फिथिी केनर : ''डंके की चोट पर कहा जाए तो जिहाद का अर्थ उनके (गैर-मुसलमानों के) खिलाफ एक निरन्तर युद्ध है। आतंकवादी हमलों के बाद, इस्लाम-समर्थकों के स्पष्टीकरणों के बावजूद बुनियादी रूप से जिहाद का अर्थ ''व्यक्तिगत मज़हबी निष्ठा'' के लिए संघर्ष से नहीं है। जिहाद राजनीति, युद्ध, और सांस्कृतिक मोर्चों पर एक संघर्ष है। (अनवीलिंग इस्लाम, पृ. १८५)

26. जॉन लाफिन ने ''होली वार इस्लाम फाइट्‌स'' में लिखा : ''जिहाद एक आवेशपर्ूा ढ़ंग से माना जाने वाला लक्ष्य है और यह इस्लाम का सबसे प्रबल हावीपन है। जैसा कि पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है, इसका शाब्दिक अर्थ ''अल्लाह के लिए असाधारण अथवा अथक प्रयास करना है।'' क्योंकि यह प्रयास किसी भी स्थिति में युद्ध से अधिक कठिन नहीं है। इसलिए जिहाद का अर्थ मज़हबी युद्ध से लगाया जाने लगा है। इसका उद्‌देश्य इंकार करने वालों को इस्लाम स्वीकार करवाना है। आधुनकि युग में इस पवित्र युद्ध से अन्य तौर-तरीके भी जुड़ गए हैं, लेकिन अल्लाह के नाम पर विजय का मौलिक सिद्धान्त यथावत्‌ बना हुआ है। सक्रियता के प्रति आवेग और इस्लामी प्रभुता के सिद्धान्त के कारण ही, पश्चिमी देशों के ईसाइयों े लिए जिहाद को समझ पाना कठिन हो गया है।''
धार्मिक युद्ध की संकल्पनाओं के नियम सदियों से वैसे के वैसे ही बने हुए हैं। वे अपरिवर्तनीय से हैं क्योंकि उन्हें कुरान में निर्धारित किया गया है, हदीसों (मुहम्मद साहब के पारम्परिक कथन और कार्य) तथा शरीयत (इस्लामी कानून) द्वारा उनका समर्थन किया गया है और फिक्ह (इस्लाम की विधि) द्वारा उनकी पुष्टि की गई है।
इस्लामी कानून की मुखय चार धाराओं के अनुसार जिहाद को छेड़ने के सम्बन्ध में मतभेद हैं। लेकिन यह मतभेद जिहाद की ऊपनी रचना के बारे में हैं, न कि उसके बुनियादी सिद्धान्त के बारे में। तेरह सदियां बीत जाने के बाद भी इस्लाम के कुछ आदेश तथा कायदे अभी भी शक्तिशाली हैं जैसे मज़हबी युद्ध में हिस्सा लेने वालों के लिए जन्नत प्राप्ति का वायदा।'' (पृ. ३९-४०)।
''इस्लामी पंथ से सम्बन्धित जिहाद का मौलिक सिद्धान्त यह है कि सम्प्रभुता लोगों के हाथों में निहित न होकर, अल्लाह में निहित है और इस प्रकार यह बात तर्क सम्मत नब जाती है कि सरकार के विरुद्ध विद्रोह को न केवल सविनय अवज्ञा के रूप में देखा जाता है बल्कि उसे अल्लाह की इच्छा का उल्लंघन भी माना जाता है। इससे भी बढ़कर यह अल्लाह की सुस्पष्ट इच्छा है कि सभी लोग इस्लाम को मानें और जो ऐसा नहीं करते हैं, प्रत्यक्षतः वे अल्लाह के दुश्मन हैं'' (पृ. ४५-४६)

27. प्रो. डेनियल पाइप्स (इन दि पाथ ऑफ गॉड, पृ. ४३-४४) : ''इस्लाम की ओर से छेड़े गए युद्ध को जिहाद का नाम दिया गया है, और आमतौर पर अंग्रेजी भाषा में इसका अनुवाद 'होली वार' (मज़हबी युद्ध) के रूप में किया जाता है। लेकिन 'होली वॉर' से यह आभासा होता है कि सैनिक अपने मन में अल्लाह को संजो कर अपने मज़हब का विस्तार करने हेतु लड़ने जा रहे हैं। यह कुुछ-कुछ मध्यकालीन यूरोपीय धार्मिक योद्धाओं अथवा सुधार सैनिकों जैसा ही है। जिहाद न्यायसंगत युद्ध से कम एक पवित्र युद्ध है जो शरीयत के अनुसार लड़ा जाने वाला मज़हबी युद्ध है। निःसन्देह जिहाद इस्लाम की ओर से है। लेकिन इसकी परिभाषा का बल वैधता पर है, न कि इसकी पवित्रता पर। एक मुसलमान अल्लाह के ध्यान अथवा लूट के खयाल से लड़ाई के लिए जा सकता है; मुखय बात यह है कि उसका व्यवहार शरियत के अनुसार होना चाहिए ताकि उसे लागू करने की सम्भावना बढ़े। यह जरूरी नहीं है कि गैर-मुसलमानों पर हर हमला जिहादी ही हो। ऐसी बहुत सी पाबंदियां हैं जिनका उल्लंघन होने पर लड़ाई शरियत के अनुकूल नहीं रहती। इसलिए वह जिहाद नहीं कहलाती है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी हमले से कोई शपथ टूटती है तो वह मज़हबी युद्ध नहीं कहलाता है। इसके विपरीत जिहाद शरियत को न मानने वाले मुसलमानों के खिलाफ भी छेड़ा जा सकता है, जिनमें मज़हब त्यागने वाले मुस्लिम तथा लुटेरे भी शामिल हैं।
 इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि जिहाद इसलिए मज़हबी युद्ध नहीं है क्योंि इसका उद्‌देश्य मज़हब को फैलाना नहीं है। आमतौर पर गैर-मुसलमान यह मानते हैं कि जिहाद का उद्‌देश्य आतंक के द्वारा इस्लामी मजहब का विस्तार करना है; वस्तुतः इसका उद्‌देश्य इस्लामी कानून का विस्तार करना है। इस्लामी कानून के सम्बन्ध में तर्कसंगत बात जिहाद है जिसका इस्लाम के विषय और राजनीतिक सत्ता के सम्बन्ध में विशेष महत्व है। अल्लाह को पाने के लिए मनुष्य को अवश्य ही शरीयत के अनुसार जीवन यापन करना चाहिए क्योंकि शरियत में ऐसी व्यवस्थाएँ हैं जिन्हें सरकार द्वारा निष्पादित किया जा सकता है, राज्य का शासन मुसलमानों के हाथों में होना चाहिए; इसलिए मुसलमानों को देश पर नियन्तण के हाथों में होना चाहिए ; इसलिए मुसलमानों को देश पर नियन्तण करना चाहिए; इस उद्‌देश्य से उनके लिए यह आवश्यक है कि वे युद्ध छेड़ें और इस प्रकार जिहाद की व्यवस्था की गई है। यदि शासन मुसलमानों के हाथों में नहीं है तो शासन की बागडोर काफ़िरों के हाथों में होगी; और काफ़िर शरियत को पवित्र कानून नहीं मानते हैं। गैर-मुसलमान सुगमता के लिए अपने शासन के विरुद्ध मुसलमानों के असन्तोष को कम से कम करने के उद्‌देश्य से इस्लाम के कुछ छोटे-छोटे कायदे-कानून लागू कर सकते हैं।
 लेकिन वे शरियत के सार्वजनिक नियमों को भी लागू करने का प्रयास नहीं करेंगे। यही कारण है कि इस्लाम, गैर-मुसलमानों को सत्ता से बेदखल करना जरूरी और आवश्यकता पड़े, तो बल प्रयोग करके 'ईमान लाने वालों', को सत्ता में लाना, आवश्यक समझता है।
तिहाद, जहाँ 'जारुल हरब' में आक्रामक है, वहीं 'दारुल-इस्लाम' में रक्षात्मक है। इस प्रकार जिहाद के कई रूप हैं-आक्रमण करना, पड़ोसियों को मदद देना, आत्मरक्षा अथवा गुरिल्ला कार्रवाई करना आदि। शासन के साथ-साथ, कबीले और अलग-अलग लड़ाकू भी अपनी ओर से जिहाद छेड़ सकते हैं। मुस्लिमों की सत्ता का विस्तार, उन क्षेत्रों में जहाँ मुस्लिम रहते हैं तथा उन क्षेत्रों में भी जहाँ वे नहीं रहते दोनों में किया जाना चाहिए क्योंकि शरियत के शासन से गैर-मुसलमानों को भी लाभ मिलता है। गैर-मुसलमानों को लाभ इसलिए मिलता है क्योंकि शरियत का शासन उन्हें ऐसे कार्य करने के लिए रोकता है जिन्हें करने के लिए अल्लाह ने मना किया हैं मुसलमानों का यह विश्वास है कि जिहाद तब तक जारी रहना चाहिए जब तक पूरी पृथ्वी पर मुसलमानों का अधिकार न हो जाए और सम्पूर्ण मानवजाति इस्लामी कानून के अधीन न आ जाए।
यह लक्ष्य ''इस्लाम का अथवा तलवार'' के रूप में जिहाद की व्यापक छवि से मेल नहीं खाता है। जिहाद का लक्ष्य इस्लाम में मतान्तरण न होकर मुसलमानों का विजय (राज्य) को आगे बढ़ाना है जिसके परिणामस्वरूप गैर-मुसलमानों को राजनीतिक रूप में दास बनाना है, न कि उनका मजहबी उत्पीड़न है। जिहाद का मुखय लक्ष्य वह नहीं है जिसे कि यूरोप के पुरानत साहितय में प्रायः समझा गया था अर्थात्‌ बल प्रयोग करके इंकार करने वालों का मतान्तरण, अपितु इस्लामी राज्य का वितसार करना और उसकी रक्षा करना है।

28. बेट ये ओर  (डिक्लाइन ऑफ ईस्टर्न क्रिश्चियनिटी अंडर इस्लाम') : ''जिहाद के सिद्धान्त खानाबदोशों की छापामार प्रवृत्तियों में लिया गया हैं मगर उन्हें कुरानक े आदेशों से नरम बनाया गया है। ..... जिहाद का लक्ष्य पैगम्बर मुहम्मद के आदेशानुसार संसार के लोगों को अल्लाह के कानून की अधीनता में लाना है................. क्योंकि जिहाद एक स्थायी युद्ध है, इसमें शान्ति की अवधारणा का बहिष्कार'' किया गया है। लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसारा अस्थायी युद्ध विराम का विधान किया गया हैं मज़हबी युद्ध (जिहाद) को इस्लाम के विद्वानों ने मज़हब के स्तम्भों में से एक माना है और उनके मुताबिक सभी मुसलमानों  के लियेयह अनिवार्य है कि वे अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार अपने शरीर, सम्पत्ति अथवा लेखन से इसमें सहयोग करें।'' (पृ. ३९-४०)
''.... जिहाद का अनुवाद आमतौर पर 'पवित्र युद्ध' के रूप में किया जाता है। (यह शब्द संतोषजनक नहीं है)। इससे दो बातों का संकेत होता है : पहला, यह युद्ध एक उग्र मज़हबी भावना से प्रेरित है और दूसरा, इसका मुखय लक्ष्य भूमि जीतना न होकर लोगों का इस्लामीकरण ळै।'' (पृ. १८)।

29. जेक्यूस एलूल : ''इस्लाम में, यद्यपि जिहाद एक मज़हबी फर्ज है, इसकी गणना 'ईमानलाने वालों' के कर्त्तव्यों में होती है और उन्हें इसे अवश्य निभाना है; यह इस्लाम के विस्तार का सामान्य रास्ता है और कुरान में जगह-जगह इसका वर्णन आता है। इसीलिए 'ईमान लाने वाला' इस मज़हबी संदेश का खण्डन नहीं करता। इसके बिल्कुल विपरीत जिहाद वह रास्ता है जिसे वह सबसे अच्छी तरह अपनाता हैं सावधानी से लिखित तथा स्पष्ट रूप से विश्लेषित तथ्यों से यह साफ़ तौर पर स्पष्ट है कि जिहाद एक आध्यात्मिक युद्ध न होकर जीत के लिए एक वास्तविक सैन्य युद्ध है। यह 'मौलिक किताब' तथा 'ईमानलोन वालों' के व्यावहारिक प्रयासों कें बीच एक समझौते को व्यक्त करता है।'' इसके साथ-साथ ''चूंकि यह केवल बाह्‌य युद्ध नहीं है, इसलिए यह मुस्लिम संसार में भी छिड़ सकता है-और मुसलमासनों के बीच अनेक युद्ध हुए हैं लेकिन उनकी विशेषताएं सदैव एक जैसी रहीं हैं।''
''इसलिए, दूसरा महत्वपूर्ण विशिष्ट लक्षण यह है कि जिहाद संस्थागत क्रिया है, न कि एक घटना अर्थात्‌ यह मुसलमानी संसार के सामान्य कार्यकलाप का एक अंग है। इसके दो कारण हैं : पहला, युद्ध से उसकी संस्थाओं की स्थापना होती है जो कि उसका परिणाम हैं। निः संदेह, सभी युद्धों से मात्र संस्थागत परवित्रन होते हैं, इस तथ्य से कि समजा में अब विजेतागण और दूसरे विजित हैं; लेकिन यहाँ हमारे सामने एक अलग ही स्थिति पैदा हो जाती है। विजित लोगों की हैसियत ही बदल जाती है (वे धिम्मी हो जाते हैं) और देश के पुराने कानून को फेंक कर उन पर शरियत लागू कर दी जाती हे। अतः विजित क्षेत्रों के केवल स्वामी ही नहीं बदलते बल्कि उन्हें बाध्यकारी सामूहिक (मज़हबी) विचारधारा के अन्तरगत लाया जाता है और धिम्मी स्थिति के अपवाद सहित उन पर परिपक्व प्रशासनिक तंत्र का नियंत्रण होता है।
अंततः इस परिप्रेक्ष्य में जिहाद इस अर्थ में संस्थागत है कि यह इस्लामी विश्व के आर्ािक जीवन में व्यपक रूप से उस तरह से सहभागी होता है जैसे धिम्मीपन करता है जिसमें उसके आर्थिक जीन की एक खास संकल्पना छिपी होती है।
इस बात को समझना सबसे अधिक महत्वपूर्ण है कि जिहाद अपने आप में एक संस्था है; अर्थात् यह मुस्लिम समाज का एक मूलभूत अंग है। मज़हबी फ़र्ज के रूप में यह मज़हबी यात्राओं आदि की तरह, मज़हबी संगठन के अनुकूल है। तथापि यह वह अनिवार्य तत्व नहीं है जो कि इस्लाम के मज़हबी चिंतन से विश्व के विभाजन से उत्पन्न हो। विश्व का विभाजन दो भागों में किया गया है; दारूल-इस्लाम तथा दारूल हरबा दूसरे शब्दों में 'इस्लामी क्षेत्र' तथा 'युद्ध क्षेत्र''विश्व अब राष्ट्रों, लोगों, एवं कबीलों में विभाजित नहीं रह गया है, अपितु वे सभी ऐसे युद्ध के विश्व में हैं जहाँ बाहरी विश्व के साथ युद्ध का ही एक मात्र सम्भव सम्बन्ध ळै। समस्त पृथ्वी अल्लाह की है और इसके स्वयं निवासियों को यह सच्चाई अवश्य माननी चाहिए। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए केवल एक ही तरीका है-वह है युद्ध। युद्ध तब स्पष्ट रूप से एक संस्था है जो कि केवल प्रांसगिक अथवा आकस्मिक संस्था नहीं है बलिक् इस संसार की रचना, चिंतन और ंसगठन का एक घटक अंग है। इस युद्ध के विश्व के साथ शांति असम्भव है। निः सन्देह, कभी-कभी युद्ध विराम करना आवश्यक हो जाता है; ऐसी परिस्थितियाँ भी हैं जिनमें युद्ध न छेड़ना बेहतर होता है। कुरान में इसकी व्यवस्था है। लेकिन इससे कुछ भी नहीं बदलता-युद्ध एक संस्था बनी रहती है, जिसका अभिप्राय यह है कि परिस्थितियों के अनुकूल होते ही इसे शुरू हो जाना चाहिए।'' (प्राक्थन, डिक्लाइन ऑफ ईस्टर्न क्रिश्चियनिटी अंडर इस्लाम, पृ. १९-२०)।

30. रूडोल्फ पीटर, (इस्लाम कानून के प्रोफेसर, युनिवर्सिटी ऑफ एम्सटरडम) : ''जिहाद के सिद्धान्त का मर्म यह है कि सम्पूर्ण इस्लामी समुदाय (उम्मा) पर शासन करने वाला मात्र 'एक इस्लामी राज्य' है। उम्मा का यह फर्ज़ है कि वह इस राजय का विस्तार करे ताकि उसके शासन के अधीन अधिक से अधिक लोगों को लाया जा सकें इसका अंतिम लक्ष्य इस राज्य की सीमाओं का इतना विसतार करना है ताकि पूरी पृथ्वी पर इस्लाम का राज्य स्थापित हो जाए और अन्य पंथों को मिटा दिया जाए।'' (पृ. ३)।
''जिहाद के सिद्धान्त का सबसे महत्वपूर्ण कार्य यह है कि यह मुसलमानों को इस बात के लिए संगठित तथा प्रेरित करता है कि वे 'इंकार करने वालों' के विरुद्ध छेड़े गए युद्ध में भाग लें क्योंकि इसे मज़हबी फर्ज़ समझा जाता है। यह प्रेरणा इस ज़बरदस्त सोच पर आधारित है कि युद्ध के मैदान में मारे जाने वाले लोग शहीद, (या शुहदा) कहलाएंगे तथा वे सीधे जन्नत में जाएंगे। 'इंकार करने वालों' के विरुद्ध लड़े जाने वाले युद्धों के दौरान धार्मिक शिक्षाएँ प्रसारित-प्रचारित की जाती हैं, जिनमें कुरान की आयतें तथा हदीस होती हैं। कुरान की इन आयतों तथा इन हदीसों में जिहाद को छेड़ने के गुणों, प्रलोभनों व लाभों का वर्णन होता हैं उनमें युद्ध में मारे जाने वाले लोगों को मृत्यु के बाद मिलने वाले इनाम (जन्नत) का भी भरपूर उल्लेख होता है।'' (जिहाद इन क्लासिकल एण्ड मॉडर्न इस्लाम, पृ. ५)।


31. बनार्ड ल्युइस : ''अधिकतर विद्वानों, न्यायविदों तथा हदीस-विशेषज्ञों ने जिहाद के कर्त्तव्य को सैनिक अर्थ में ही लिया है।'' (पौलिटिकल लैंग्वेज़ ऑफ़ इस्लाम, पृ. ७२)।

32. डॉ. के. एस. लाल  (इस्लाम के विखयात इतिहासकार) : ''कुरान अन्य पंथों के अस्तित्व और उनके मज़हबी रीति-रिवाजों के बने रहने की आज्ञा नहीं देता है। कुरान की ६३२६ आयतों में से ३९०० आयतें प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से 'काफ़िरों', 'मुशरिकों', 'मुनकिरों', 'मुनाफिकों' अथवा अल्लाह एवं उसके पैगम्बर पर 'ईमान न लाने वालों' से सम्बन्धित हैं। मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि ये ३९०० आयतें दो श्रेणियों के अन्तर्गत आतीं हैं। पहली श्रेणी की आयतें उन मुसलमानों से सम्बन्धित हैं जिन्हें उनके 'ईमान लाने' के लिए इस संसार में तथा इस संसार के बाद पुरस्कृत किया जाएगा, और दूसरी र्श्रेणी की आयतें उन 'काफ़िरों' तथा 'इंकार करने वालों' से सम्बन्धित हैं जिन्हें इस संसार में दण्ड दिया जाना है और जो मृत्यु के बाद निश्चित रूप से जहन्नम में जाएंगे।''
''कुरान सम्पूर्ण मानवजाति के लिए भाईचारे का ग्रंथ न होकर मानवजाति के विरुद्ध एक युद्ध की नियम पुस्तिका (मैनुअल) जैसी है। अन्य पंथों के अनुयायियों के विरुद्ध, जिहाद अथवा स्थायी युद्ध, कुरान का आदेश है और यही युग का आदेश है। इस्लाम अन्य पंथों के अनुयायिों के खिलाफ़ जिहाद अथवा लगातार युद्ध की सिफ़ारिश करता है ताकि उन्हें पकड़ लिया जाए, उनके सिर काट दि जाएं और उन्हें जहन्नम की आग में जलाया जा सके। इससे इस्लाम कट्‌टारवादी तथा आतंकवादी मज़हब बन जाता है जैसा कि उसका उत्पत्ति से लेकर अब तक यही रूप रहा है। (थ्यौरी एण्ड प्रेक्टिस ऑफ मुस्लिम स्टेट इन इंडिया, पृत्र ५-६)
कुरान, हदीसों, इस्लामी कानूनों एवं इस्लाम के विद्वानों के ऊपर कहे गए कथनों से पाठकों को सुस्पष्ट हो गया होगा कि जिहाद का मुखय अर्थ गैर-मुसलमानों को इस्लाम में धर्मान्तरित करना और उनके सभी देशों को अल्लाह के कानून-शरियत के अधीन लाना है चाहे इसके लिये सशस्त्र युद्ध ही क्यों न करना पड़। फिर भी कुछ मुसलमान इस्लाम को शान्ति का मज़हब कहते हैं। मगर उनके इस कथन में भी कुछ सच्चाई हैं क्योंकि जिहाद के दो चेहरे हैं : एक शान्ति का, दूसरा खुनी युद्ध का।


                                                   स्रोत : हिंदु राईटर फोरम